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Thursday, August 16, 2012

भोली चाँदनी


शाम की खिड़कियाँ खोल के,
साज़ में मुरकियाँ घोल के,
आ उतर जा गोरी चाँदनी,
आँख की झिड़कियाँ तोल के...

बेहिसी में पड़ी
ख्वाहिशें बावरी
दो पलक मोड़ के
ताकती हैं हर घड़ी -
पूछती हैं कब मिले
रोशनी के काफिले,
खोजती हैं कब दिखे
ज़िंदगी के सिलसिले -
ज़र्द इनकी देह पर
रख दे दो-इक अंगुली
ओ री भोली चाँदनी,
नर्म-सी कुछ बोलियाँ बोल के...

साज़ में मुरकियाँ घोल के..

- Vishwa Deepak Lyricist