Showing posts with label paagalpan. Show all posts
Showing posts with label paagalpan. Show all posts

Sunday, March 28, 2010

पागलपन हीं मेरा फ़न है...


पागलपन हीं मेरा फ़न है!

"खुसरो" का मैं बूझ-पहेली,
अंतर यह कि उत्तर जिसका,
एक नहीं..
बदले हरदम है...

बानगी देखो
कि मिट्टी-सा
सौंधा कभी
कभी मटमैला,
कभी फूल तो कभी
हज़ारों काँटों से
रंजित यह वन है...
यह जो मेरा अगम-अगोचर-
अलसाया-सा अद्भुत मन है.......

मुझे संवारे, मुझे निखारे
मुझको मेरा सच बतला दे
ऐसा कहाँ कोई दर्पण है..

और क्या कहूँ,
यही बहुत है..
मुझे जानने वाले कहते
कभी राम
तो कभी विभीषण
और कभी मुझमें रावण है..
पागलपन हीं मेरा फ़न है....


-विश्व दीपक