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Saturday, June 23, 2012

असमंजस


लटें
कान के पीछे,
कुछ-कुछ आँखों पर,
एक-दो नाक के ऊपर
हसुली जैसे
एक-चौथाई चाँद-सी,
दो-चार चूमती गालों को
और
बाकी जंगल के अनछुए रस्तों की तरह
गरदन के इर्द-गिर्द
तो कुछ गरदन के परे
फ़लक से ज़मीं की ओर....

इन्हीं लटों ने
बाँध रखा है मुझे.

कभी उतार देती हैं आँखों में
तो कभी कराती हैं सैर जिस्म की..

इनसे छूटूँ तो सोचूँ -
जहां में और क्या है,
इनसे बंधकर
तो जहां है... बस तुझसे तुझ तक....

- Vishwa Deepak Lyricist