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Monday, February 22, 2010

ज़ीनत


मुखड़ा :

होठों को खोलूँ न खोलूँ, बता,
आँखों से बोलूँ न बोलूँ, बता,
साँसों की भीनी-सी खुशबू को मैं,
बातों में घोलूँ न घोलूँ, बता..

तू बता मैं किस अदा से
ज़ीनत का दूँ हर शै को पता..
तू बता जो इस फ़िज़ा को
ज़ीनत सौंपूँ तो होगी ख़ता?

होठों को खोलूँ न खोलूँ, बता,
आँखों से बोलूँ न बोलूँ, बता,
साँसों की भीनी-सी खुशबू को मैं,
बातों में घोलूँ न घोलूँ, बता..

अंतरा 1:

है ये मेरे तक हीं,
ज़ीनत है ये किसकी
आखिर तेरा है जादू छुपा...

मैं तो मानूँ मन की
ज़ीनत जो है चमकी
आखिर तेरी हीं है ये ज़िया...

तू जाने कि तूने हीं दी है मुझे,
ये ज़ीनत कि जिससे मेरा जी सजे,
तो क्यों ना मेरा जी गुमां से भरे?
तो क्यों ना मैं जी लूँ उड़ा के मज़े?

हाँ तो मैं हँस लूँ न हँस लूँ, बता,
फूलों का मस्स लूँ न मस्स लूँ, बता,
धीरे से छूकर कलियाँ सभी,
बागों से जश लूँ न जश लूँ बता..

अंतरा 2:

यूँ तो फूलों पर भी,
ज़ीनत की लौ सुलगी,
लेकिन जी की सी ज़ीनत कहाँ?

जैसे हीं रूत बदली,
रूठी ज़ीनत उनकी,
लेकिन जी की है ज़ीनत जवाँ..

जो फूलों से बढके मिली है मुझे,
ये ज़ीनत जो आँखों में जी में दिखे,
तो क्यों ना मैं बाँटूँ जुबाँ से इसे?
तो क्यों ना इसी की हवा हीं चले?

हाँ तो मैं हँस लूँ न हँस लूँ, बता,
फूलों का मस्स लूँ न मस्स लूँ, बता,
धीरे से छूकर कलियाँ सभी,
बागों से जश लूँ न जश लूँ बता..

तू बता मैं गुलसितां से
ज़ीनत माँगूँ या कर दूँ अता....


-विश्व दीपक