Friday, March 07, 2008

दंडकारण्य

कभी दंडकारण्य में विचरते थे-
दैत्य-दानव,पिशाच!
वे
अनगढे-से
अकारण हीं
विकराल रूप धरते थे,
खर-खप्पर,कृपाण-कटार का
दंभ भरते थे,
आप हीं असहज-असह्य थे,
परंतु दूसरों पर
अट्टहास करते थे।

कहते हैं-
वह दंडकारण्य-
देवताओं हेतु भी दुर्गम था,
परंतु
दुर्भाग्य कि
पंचवटी और विन्ध्याचल के मध्य
सेतु था वह।

वहाँ ,
दो तपोभूमियों के मध्य,
असुरों ने
अधिकारवश
अधर्म के शूल बोए थे।
साधु-
जो गुजरते थे,
पथ के कंटक चुन जाते थे,
परंतु पथ पर अधिकार जमाते न थे,
पथ से भयभीत थे,
परंतु पथभ्रष्ट न थे,
उन्हीं
उत्तर या दक्षिण के तपोभूमियों के थे,
परंतु अरण्य से द्वेष न रखते थे।

और वहीं
कुमति असुर
सौभाग्य और दुर्भाग्य
की परिभाषा से भी
अनभिज्ञ थे।

उसी दंडकारण्य में-
कभी धर्म ने भी पाँव धरे थे,
इतिहास कहता है कि
किन्हीं खर-दूषण असुरों का
एक राम ने वध किया था,
आश्चर्य यह कि
उस राम ने
तेरह वर्ष
उस वन में हीं
व्यतीत किये थे,
मान्यता है कि वह राम
उत्तर का था,
परंतु महत्वपूर्ण यह है कि
वह पथभ्रष्ट न था,
पथप्रदर्शक था।

वह दंडकारण्य-
फिर भी "दंडक" हीं रहा,
दो तपोभूमियों के मध्य
एक तपोवन न बन सका,
क्योंकि कुछ असुर,
असुर हीं रहे
और वह भी अनभिज्ञ-से।

वही दंडकारण्य,
सिकुड़कर अब
"महाराष्ट्र" कहलाता है,
और
आह! अब भी
कुछ राक्षस-"राज" विचरते हैं वहाँ
और दुर्गति यह कि
अब भी
"बाल"-सुलभ कृत्य करते हैं।

अत: निस्संदेह हीं
"उत्तर" का कोई अन्य राम
वर्षों से उस अरण्य में
नक्षत्रों के मेल की
राह तक रहा है।

लोकमत है कि
इतिहास स्वयं को दुहराता है!!!!

-विश्व दीपक 'तन्हा'

पंचवटी आंध्र-प्रदेश में "भद्राचलम" के समीप है और विन्ध्याचल उत्तर प्रदेश के "मिर्ज़ापुर" जिले में अवस्थित है। "दंडकारण्य" पूरे बस्तर (छत्तीसगढ), उड़ीसा, मध्य प्रदेश , महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों में फैला हुआ था। भूगोल की माने तो ये हिस्से इन दोनों तपोभूमियों के मध्य हीं आते है।

15 comments:

रंजू said...

बहुत सही कविता आज के सच को उजागर करती !!

DR.ANURAG ARYA said...

aapki hindi par bhi urdu ki tarah khasi pakad hai aor kavita ...ka vishya sarahniya hai.

Nishant Neeraj said...

hmmm... quite a research.
Achcha samaanyikaran kiya hai.
Aur unlike kavi... aapne khule aam naam bhi le rakhaa hai... Raaj Thakrey... hmmm... great mere veer ras ke kavi!

On a lighter note - Raam kaun banega yeh to pataa nahi... par Sugreev Amitabh Bachchan zaroor honge.

-Nishant

Dheeraj Baid said...

Bahut Sundar...kavita bhi aur kavita ka vishay bhi....!!!!

amrendra kumar said...

bahut sahi VD bhai...we r proud of u, proud of being a Bihari and proud of being an Indian too..

samir said...

Aajkal ki paristhi ko itihas se dhoond nikala hai aapne..bahoot khoob VD bhai..."Wo dandakanya devtaon hatu bhi durgam tha" to hum bhi haath pe haath de ke baithe rahen..kya un rakshason ka kuch nahin kiya jaa sakta, unka pathpradarsak kaun banega....ispe bhi kuch likhiye...

शैलेश भारतवासी said...

आपकी कविता में उदय प्रकाश की कविताओं जैसा शोध दिखता है, लेकिन आपने भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल करके इसे किसी भगवत-भक्ति पत्रिका में प्रकाशित होने लायक बना दिया है। और कविता पूरे तरह से बाँध भी नहीं पा रही है।

tanha kavi said...

शैलेश जी,
अगर रामायण काल का वर्णन होगा , तो उसमें उर्दू के शब्द नहीं डाले जा सकते और साथ हीं कविता पढ कर लगना चाहिए कि वह रामायण के समय की कोई बात पढ रहा है। इसलिए वैसे शब्दों का प्रयोग करना पड़ा।
और हाँ!मुझे नहीं लगता कि ये शब्द भारी-भरकम हैं,क्योंकि इन्हें समझने के लिए एक हिन्दी जानने वाले पाठक को शब्दकोष की जरूरत नहीं पड़ती। दूसरी बात यह कि राम का नाम ले लेने से भगवत-भक्ति की बात नहीं आ जाती,दूसरे धर्म वाले तो खुलकर अपने खुदा या christ का नाम लेते हैं,तो क्या वे हमेशा मस्जिद या गुरूद्वारे में हीं होते हैं, अजान या prayer हीं कर रहे होते हैं। आप सोचिएगा!!

आपको मेरी कविता में शोध अच्छा लगा, इसके लिए शुक्रिया।

-विश्व दीपक ’तन्हा’

Anonymous said...

bahut sateek chitran kiya hai...aaj ke sach ka...
abhi tak raan prakat nahi huye hai to iska taatparya to yahi ho sakta hai ki paap abhi tak apne shikhar pe nahi hai...

VINEET BHARDWAJ said...

Shabdon ka khoobsoorat prayog aur itihaas mein vartmaan ka bejod chitran.........meri rai mein ek behtareen prayaas......un band aankhon ko kholne ke liye jinki palkein sankeern mansikta se chipki hui hain.

Ummeed karta hoon aapke shabd kisi na kisi ram ko zaroor utprerit karenge.

आलोक शंकर said...

खर-खप्पर-कृपाण-कटार
yaha se '-' hata dijie
खर-खप्पर me 'kh' kaa anupras hai
कृपाण-कटार me 'k' ka anupras alankaar hai
dono ko alag rakhiye. similarly,
दैत्य-दानव-पिशाच! - दैत्य-दानव ,पिशाच!
आरण्य - अरण्य
और वो भी अनभिज्ञ-से।-- yaha वो kaa prayog sentence ke weight ko kam kar raha hai, iske jagah 'vah' ya fir 've' kar dijiye . tatsam yukt bhasha me 'vo' kam hi prayukt hota hai.

good research on the topic.
Kavita ka plot bahut sundar hai.
aur nirvah bhi thik hai.
is par bahut kuch aur likha ja sakta tha. par apne simatkar nape tule andaj me baat kah di hai , ye bahut acha hai.
bhasha ka satik prayog hai

alokadvin said...

awesome writing ... i liked the comparisons very much (uttari saints ). Its amazing how u rekindle that magic of urs in every piece.

c'min to the topic -- well wat to say someone mi8 wanna teach "asurs" the term globalization, this is not even dat, maybe nationalization. Its pity to see how thing are managed in an international hub.

Its only a matter of time when the best will displace and take their rightful place. Looking beyond the barriers of religion, place is the need of the hour.

xoxo
aL

amy said...

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