Friday, June 05, 2009

शहतूत

मैं अब भी वहीं उलझा हूँ,
शहतूत की डाल से
रेशम के कीड़े उतारकर
बंजर हथेली को सुपूर्द किए
महीनों हो गए,
तब से अब तक
न जाने कितनी हीं
पीढियाँ आईं-गईं,
कितने अंडे लार्वा में तब्दील हुए,
कितने हीं प्युपाओं के अंदर का लावा
खजुराहो की मूर्त्तियों तक
उफ़न-उफ़न कर
शांत हुआ
या ना भी हुआ,
कितनों ने औरों के हुनर से
रश्क कर
लार टपकाया तो
कितनों ने लार गटका,
मजे की बात यह है कि
इंसान का लार हो तो
एक "आने" को भी तरस जाए,
लेकिन
जिस लार से रिश्ते सिल जाएँ,
उसके क्या कहने!
हाँ तो, न जाने कितनों ने
कितनों के हीं इश्क से
रश्क किया,
फिर भी
कईयों ने इश्क किया
और मैं
चुपचाप तकता रहा,
सीधी हथेली किए
उन लारों को बटोरता रहा,
जिसे श्लील भाषा में रेशम कहते हैं;
मौसम आए गए
कितनों के मौसम बदले,
लेकिन
न मेरी लकीरें हीं रेशम की हो सकीं
और न मेरा
इश्क हीं रेशमी...
मैं
शहतूत के पत्तों की भांति
ठिठका रहा,
सुबकता रहा
और
किस्मत का लेखा देखिए कि
अब भी
बिन कारण वहीं उलझा हूँ,
शायद अब भी उम्मीद दम ले रही है।

-विश्व दीपक ’तन्हा’

Monday, March 30, 2009

नारी-मन और उम्र

उम्र हाय!
यह उम्र निगोड़ी,
उड़नखटोले पर जो बैठी,
बढती जाए थोड़ी-थोड़ी,
इस वसंत से उस वसंत तक,
मन के साथ करे बरजोरी,
उम्र हाय!
मेरी उम्र निगोड़ी।

सखियन के बाँहों में बाँहें,
डाल-डाल फिरती थी जो मैं,
कहाँ भला थिरती थी तो मैं,
एक थाल से दूजे थाल तक,
एक डाल से दूजी डाल तक,
उछल-उछल के, फुदक-फुदक के,
हवा संग गिरती थी तो मैं;
अब तो राम!
गया वह दौर,
मन उत है, पर इत है ठौर,
अब तो राम!
बस एक मलाल,
ना कहीं, पात, ना कहीं डाल,
चहुँ ओर इक लाख सवाल,
रिश्तों के रस्ते के अलावा,
उम्र ने कोई डगर नहीं छोड़ी,
उम्र हाय!
मेरी उम्र निगोड़ी।

आध-आध दर्जन भर मन की
सोच-वोच थी एक हीं जैसी,
ललक-लोच थी एक हीं जैसी,
मन जो भाए, कर जाती थीं,
मन का करके, तर जाती थीं,
मन की भांति हम सारी भी
नि:संकोच थीं एक हीं जैसी,
अब तो राम!
भय निर्भय है,
कौन हूँ मैं, यही संशय है,
अब तो राम!
हया है भारी,
जोश है मूर्छित , मैं बेचारी,
रह गई मैं, नारी की नारी,
अबला कर के अल्प-भाग्य से,
उम्र ने मेरी गाँठ है जोड़ी,
उम्र हाय!
मेरी उम्र निगोड़ी!!

अब तो इस विध हीं जीना है,
सोचती हूँ गरल पीना है,
लेकिन यह क्या....कैसा स्वर है,
मस्तिष्क कहता ....तुमको ज्वर है?
फिर क्यों , ऎसा सोच रही हो..
खुद को हीं खरोंच रही हो?
सुन रे नारी, सच बतलाऊँ,
तुमको सत्य की राह दिखाऊँ.....
"उम्र का क्या है,
एक संख्या है,
तब बढती, जब मन विह्वल हो,
भय का क्या है,
बस व्याख्या है,
मन देता, जब वह निर्बल हो|
नारी देख! तुझमें भी बल है,
तू पूरे घर की संबल है,
तो फिर भाग्य-भरोसे क्यूँ है,
अपने वय को कोसे क्यूँ है,
लोक-लाज का ध्यान हटा दे,
यौवन का अरमान हटा दे,
यौवन तो अब भी तुझमें है,
बस तुझको हीं संशय है...
संशय त्याग, खोल ले अंखियाँ,
देख तुझे, ढूँढे हैं सखियाँ !!!"

आह! आज के आज फिर से
आध-आध दर्जन भर मन में
एक हीं जैसी हूक उठी है,
वसंत है, कोयल कूक उठी है,
और वो देखो
शर्म की मारी
छिपी जा रही चोरी-चोरी,
उम्र हाय!
मेरी उम्र निगोड़ी!!

--विश्व दीपक ’तन्हा'

Monday, February 02, 2009

आसमानी ओस...

आसमानी ओस!
अंबर से बहके,
चले छलके-छलके,
घुले जो,मिले जो,
हवा के तले जो,
करे सबको पुरनम,
मद्धम हीं मद्धम,
तरल यह,सरल यह,
सहनशील-दुस्सह,
यह उजली-सुनहरी,
रजनी की चितेरी,
कुछ लहरे हीं ऎसे,
जो हो राग जैसे-
भैरवी,मालकोंश!
आसमानी ओस!!

आसमानी ओस!
जब हीं है तरसे,
गिरे जो अधर से,
करे एक हीं घर,
वर्तुल लबों पर,
एक सुंदरतम डेरा,
सुकोमल बसेरा,
यह होठों से जुड़ के,
देखे हीं मुड़ के,
पले फिर,फले फिर,
थमे फिर अस्थिर,
ज्यों संवरे उभय हीं,
गले हर हृदय हीं
खोकर सब होश!
आसमानी ओस!!

आसमानी ओस!
है प्रेम की हीं
अमित एक झाँकी,
यदि दूब पे है,
मिट्टी की मय है,
यदि पत्तों पे है,
लगे किसलय है,
रहे तुंग शिख पे,
अमर-दूत बनके,
सजे धूप में यों,
कनक-कण जले ज्यों,
पर वैभव यह पाये,
जो तुझपे ढल जाये-
हो पावन,निर्दोष!
आसमानी ओस!!

-विश्व दीपक ’तन्हा’

Tuesday, December 02, 2008

अनकथ तेरी शहादत को, किस पैमाने पर तोल लिखूँ?

दो बोल लिखूँ!
शब्दकोष खाली मेरे, क्या कुछ मैं अनमोल लिखूँ!

आक्रोश उतारुँ पन्नों पर,
या रोष उतारूँ पन्नों पर,
उनकी मदहोशी को परखूँ,
तेरा जोश उतारूँ पन्नों पर?

इस कर्मठता को अक्षर दूँ,
निस्सीम पर सीमा जड़ दूँ?
तू जिंदादिल जिंदा हममें,
तुझको क्या तुझसे बढकर दूँ?
अनकथ तेरी शहादत को, किस पैमाने पर तोल लिखूँ?

मैं मुंबई का दर्द लिखूँ,
सौ-सौ आँखें सर्द लिखूँ,
दहशत की चहारदिवारी में
बदन सुकूँ का ज़र्द लिखूँ?

मैं आतंक की मिसाल लिखूँ,
आशा की मंद मशाल लिखूँ,
सत्ता-विपक्ष-मध्य उलझे,
इस देश के नौनिहाल लिखूँ?
या "राज"नेताओं के आँसू का, कच्चा-चिट्ठा खोल लिखूँ?

फिर "मुंबई मेरी जान" कहूँ,
सब भूल, वही गुणगान कहूँ,
डालूँ कायरता के चिथड़े,
निज संयम को महान कहूँ?

सच लिखूँ तो यही बात लिखूँ,
संघर्ष भरे हालात लिखूँ,
हर आमजन में जोश दिखे,
जियालों-से जज़्बात लिखूँ।
शत-कोटि हाथ मिले जो, तो कदमों में भूगोल लिखूँ!
हैं शब्दकोष खाली मेरे, क्या कुछ मैं अनमोल लिखूँ?

-विश्व दीपकतन्हा

Friday, October 17, 2008

तेरी विधा तो एक पहेली है।

कल मद्यपान से हाय-तौबा,
आज मद्यपान जीवन की शोभा,
गुरु तेरे सान्निध्य ने यह क्या कर डाला है,
तेरे संग से मेरा चाल-ढंग भी हुआ निराला है।

कल बाबूजी से छुप-छुप कर,
मस्ती का लिए लाव-लश्कर,
स्वप्न-लोक जब पहुँचा था,
कुछ पल को मैं तब सकुंचा था,
आँखों में सूरज पिघला था,
लब पर धुएँ का छ्ल्ला था,
वो मेरी प्रथम कमाई थी,
सिगरेट बन मुझ तक आई थी,
पर संस्कार तो जिंदा था,
मैं खुद पर तो शर्मिंदा था,
आज तूने मेरे हृदय से छीना उजियाला है,
तेरे संग से मेरा चाल-ढंग भी हुआ निराला है।

कल जिस कूँची से उपजा था,
जिसकी सूची से उपजा था,
जिसने रूह उकेरा था,
वही , मेरा जो चितेरा था -
पथ-कुपथ उसी ने आँके थे,
सही-गलत के निर्णय टाँके थे,
कल तक मेरे शब्द भी अपने थे,
घर में पलते कई सपने थे,
पर आज कूँची तो तेरी है,
तेरी विधा तो एक पहेली है।
इस चित्रपट पर रंगों का निकला दीवाला है,
तेरे संग से मेरा चाल-ढंग भी हुआ निराला है।

अब सपनों के रंग नए-से हैं,
रंग दिल के तो अनचढे-से हैं,
कई रंग तो हो गए फीके हैं,
होने के ही सरीखे हैं
तूने जो कूँची थामी है,
मूल्यों की हुई निलामी है,
मुझको इस कदर संवारा है,
रिश्तों को किया किनारा है,
तू देव जो जग के धन का है,
चित्रकार मेरे जीवन का है,
मेरा जीवन ही तेरी प्रतिभा का साक्षात निवाला है,
तेरे संग से मेरा चाल-ढंग भी हुआ निराला है।

विश्व दीपक 'तन्हा'