Friday, September 19, 2008

गमनशीं

जिनके घर लगे हों यादों के काफ़िले,
इन अश्कों के अक्स से आ मिले।

कतर डाले हैं मैने पर अंधेरों के,
फिर कफ़स में शब से कैसे गिले ।

इक आह और आह! दरार चाँद में,
दरार सिल जाए , दर्द कैसे सिले।

हरदम हीं खुदाया! हैं सालते मुझे,
जिंदगी औ मौत के सब बहाने छिले।

होना मैने आप का ढो लिया सालों,
न होना तेरा इस रूह से कैसे हिले।

रौनक उन लबों की हो मेरे जिम्मे,
गमनशीं ’तन्हा’ के ख्वाब हैं खिले।


-विश्व दीपक ’तन्हा’

6 comments:

श्रद्धा जैन said...

bhaut shaandaar gazal

अरूणा राय said...

बहुत ही सुंदर .
बधाई

RC said...

इक आह और आह! दरार चाँद में,
दरार सिल जाए , दर्द कैसे सिले।

RC said...

Thanks for your response to my poem 'tera ishq' on kavimitra. There was a mixed reaction and I felt it necessary to thank those who took time to appreciate it. The post has become old and out of list, so I had to explicitly inform you to please read my new comment on the same.

sa said...

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Nishant Neeraj said...

keep writing dude.
Naishe