Wednesday, May 17, 2006

तात,यह मेरा आंग्लिक ज्ञान

आंग्ल भाषा हम भारतवासियों के लिए कितना मायने रखती है, इसका ज्ञान हमें त़ब होता है, जब कोई हमसे पूछ बैठता है कि क्या हम इसे धाराप्रवाह बोल सकते है. कुछ ऐसा हीं प्रश्न मेरे एक प्रियजन ने मुझसे पूछा और तत्पश्चात मुझे अपने आंग्लिक ज्ञान का भान हुआ.
उसी घटना के उपलक्ष्य में 'मैं' आज सबके सामने आंग्ल
भाषा और अपने आंग्लिक ज्ञान के रहस्यमय तथ्यों को अनावृत करने को प्रस्तुत हूँ.


तात,यह मेरा आंग्लिक ज्ञान,
मानो देवल में मयपान,
मानो नभ में हो श्मशान,
मानो जन्तु पंख वितान,
मानो सुधा हो गरल समान,
मानो विज्ञ अज्ञ अंजान,
मानो तड़ित जड़ित भय-भान,
तात,यह मेरा आंग्लिक ज्ञान.
तात,यह मेरा आंग्लिक ज्ञान,
मानो नीरद नीरस निष्प्राण,
मानो निशिचर हो दिनमान,
मानो सत्त्व तत्व-हित विधान,
मानो सरवर हो सुनसान,
मानो अशोक शोक-संज्ञान,
मानो बुद्ध हो बिन निर्वाण,
तात,यह मेरा आंग्लिक ज्ञान.
तात,यह मेरा आंग्लिक ज्ञान,
मानो गर्दभ को श्रमदान,
मानो श्वान रहित निज घ्राण,
मानो काक को पिक पहचान,
मानो शूकर शुचि-सुजान,
मानो तुरग को पद-अभिमान,
मानो आंग्ल खगोल-विज्ञान,
तात,यह मेरा आंग्लिक ज्ञान.
-तन्हा कवि

3 comments:

अपरिभाषित शब्द said...

आपकी कविता बहुत ही अच्छी लगी| बहुत दिन बाद इतनी अच्छी हिन्दी का प्रयोग देखा………

archana said...

wah.... bahut khoob....ishara kiya hai.... achchi soch hai..

archana

nagmani said...

aapki kavita kaafi achchi lagi.........likhte waqt aapne kaafi imaandaari dikhaai hai.....achcha hai kaafi achcha hai!!!