Monday, April 19, 2010

हुनर


मुझे बस ये हुनर दे दे,
मेरे कांधों पे सर दे दे।

निभा लूँगा मैं तारों से,
मुझे बस तू सिफर दे दे।

बुझी जाती है आवाज़ें,
निगाहों में शरर दे दे।

भिड़ूँ कैसे बिसातों से,
दलीलों के भंवर दे दे।

यूँ हीं तन्हा गुजर कर लूँ,
मुझे जो तू जिगर दे दे।


-विश्व दीपक

5 comments:

SKT said...

wah! bahut khoob!

shanno said...

I like it too..very heart touching..

विश्व दीपक said...

अंकल जी (क्योंकि आप हनु के पिताजी हैं),
आपकी टिप्पणी यहाँ देखकर बहुत हीं अच्छा लगा। रचना पसंद करने के लिए आपका तह-ए-दिल से आभार!

शन्नो जी,
कुछ अलग लिखने की कोशिश थी। उम्मीद करता हूँ कि मैं सफ़ल हो पाया हूँ।

-विश्व दीपक

shanno said...

Vishwa ji, your poems are very beautiful in their own unique style...keep writing..and if you ever have a collection of these published in a book form I would love to buy one.

विश्व दीपक said...

shanno ji,
dhanyawaad ;)