Friday, February 12, 2010

इन लबों के इर्द-गिर्द


मैं तुम्हारे इन लबों के इर्द-गिर्द
एक तिल भर आशियाना चाहता हूँ..

देखने को सुर्खियाँ गीले लबों की
उम्र भर का ये ठिकाना चाहता हूँ...

जब सजे इनपे तबस्सुम की लड़ी
गिरते मनकों को उठाना चाहता हूँ..

ना लगे इनकी शुआओं को नज़र,
पास में काजल चढाना चाहता हूँ...

लफ़्ज़ बरसें जो लरजते बादलों से
छानकर गज़लें बनाना चाहता हूँ...

काट ले तू झेंपकर जब भी इन्हें,
थोड़ा-सा गुस्सा चबाना चाहता हूँ...

या कि खींचे इनको तू अंगुलियों से,
मैं तभी नखरे दिखाना चाहता हूँ...

सच कहूँ तो इन लबों के हुस्न में
चार चाँद मैं लगाना चाहता हूँ...


-विश्व दीपक

5 comments:

rakesh said...

agar kuchhh chaahta hai ...to ajakar maang kyun nahi leta???

Go n propose ...its V day week dude...

abb nahi to kabb??

भूपेन्द्र राघव । Bhupendra Raghav said...

देखकर तुमको कलम गह हाथ में
शास्त्र एक ऐसा बनाना चाहता हूँ
शब्द जिसका प्रेम रस में हो पगा
भोग में सबको खिलना चाहता हूँ
अक्षय होगा पात्र मेरा तुमसे ही
मै विदुर को रस पिलाना चाहता हूँ

डॉ .अनुराग said...

superb.............

श्रद्धा जैन said...

bahut khoobsurat meethi gazal
dua hai ji jo dil chahta hai tumhe wo sab mile

विश्व दीपक said...

raghav ji,
aapki rachna padhkar to mujhe apni rachna chhoti aur kamtar lagne lagi. Shabdon ka athaah bhandaar hai aapke paas. Humein aise hi maarg-darshit karte hain

Doctor saaheb,
aapne saraaha... mere liye ye ek certificate ki tarah hai ki 'MAIN BHI THIK THAK LIKH LETA HOO' :)

didi,
mujhe pata nahi ki ye gazal ke maap-dandon pe khada utarta hai ya nahi, lekin chuki aapne ise gazal kaha hai.. to mere liye ye ek "muhar" hai. Ab chuki aap didi hi hain to aapki duaa mere saath waise hi rahti hai :) Phir bhi dhanyawaad :)

-Vishwa Deepak