Wednesday, June 13, 2007

वक्त

वक्त-
एक कूली है,
वादों को ढोता है

और
लम्हों की मजूरी लेता है।
वादे अगर बढ जाते हैं
तो थककर बैठ जाता है।
बड़ा ईमानदार है,
फिर मजूरी भी कम लेता है।
और लोग कहते हैं

कि
वक्त गुजरता हीं नहीं।


-विश्व दीपक ’तन्हा’

11 comments:

BiDvI said...

वाह दीपक जी ,
क्या ख़ूब लिखे है .......
वक़्त वादों को ढो ता है
इसनसानी मन की कशमकश और समय पे दोषा रोपण को
क्या ख़ूब पंक्ति बद्ध किया है

आपकी लेखनी का मैं कायल हो के रह गया....

Anonymous said...

अच्च्ही पन्क्तियां लिखी है आपने वक्त के प्रति मानव की उपेश्ह्हा पर

alokadvin said...

startin lines r cool....
make sense in the context of the poem... keep it up

Anupama Chauhan said...

ise hi kahete hain chand panktiyon me saari baat kah jaana...waqt se waqt ki suhaani muthbedh darshai hai.

salman said...

acchi kavita likhi , dil prassan ho gaya shabdo ka chayan , evam bhavo ki abhivaykti puri tarah se hui hai sadhu wad

Gaurav Shukla said...

दीपक जी,
आपकी इस विधा से भी परिचय हुआ आज और आशानुरूप फिर आपके माध्यम से गंभीर काव्य पढने को मिला
बहुत अच्छा लिखा है आपने

"वक्त-
एक कूली है,
वादों को ढोता है
और
लम्हों की मजूरी लेता है।"

ह्म्म्म्, क्या बात है
बहुत सुन्दर

सस्नेह
गौरव शुक्ल

Sarvesh said...

manaspatal par aaya hua har sabdh chota lagta hai,
iss bhav par tippni karna kaafi bhari lagta hai....
ur words r really kool n touching..

divyanshu said...

hmmmm.....baat mein dam hai...kavita ki laghuta hi uskee sundarta hai...jai hind...

गिरिराज जोशी "कविराज" said...

वक्त, कूली के रूप में!!!!! तन्हाजी, आपकी कल्पना बताती है कि वक्त को बहुत करीब से समझा है आपने, आपकी अंतिम पंक्तियाँ -

और लोग कहते हैं
कि
वक्त गुजरता हीं नहीं।


थके-हारे मजदूर की सोते समय ली जाने वाली लम्बी जम्हाई सी लगी।

बधाई स्वीकार करें।

राजीव रंजन प्रसाद said...

गहराई है रचना में..

*** राजीव रंजन प्रसाद

shrdh said...

aur log kahte hain ki waqt guzarata nahi bahut gahri baat