Thursday, April 05, 2007

मैं

सीधी-सादी बोली से कुछ शब्द उधार मैं लेता हूँ,
फिर बाणिक को मैं ब्याज-सहित अपना काव्यालय देता हूँ।

माँ भारती के चरणों से अपनी जिह्वा तर करता हूँ,
फिर भारत माँ के मस्तक पर अंतरिक्ष का रूख मैं जड़ता हूँ।

मैं उर्दू के अल्फाज़ जब भी अपने छंदों में भरता हूँ,
गंगा के जल को पाँच वक्त अशआर नज़र मैं करता हूँ।

मैं पिता की तनी कमर बनकर सीने को संबल देता हूँ,
सफ़हों पे उनके सपनों को स्याही के दम पर सेता हूँ।

मैं बहना की चुन्नी बनकर उसके माथे पर रहता हूँ,
राखी की लाज लेखनी में भरता हूँ, खुद को लहता हूँ।

मैं प्रियतमा की मेंहदी में बसे प्रेम-चंद्र पर रजता हूँ,
उसके ख्वाबों का बन चकोर हर एक छंद में सजता हूँ।

मैं माँ को उसके बेटे का हर एक रूप दिखलाता हूँ,
अपनी मैय्यत का बोध करा उन आँखों के मोती पाता हूँ।

मैं अमर के शब्दचित्र में उतरी एक छोटी-सी कविता हूँ,
है शुक्र कि मैं भी उस जैसा कई लोकों का रचयिता हूँ।

शब्द-कोष ->
अशआर=गज़ल/शायरी
सफहों= कागज़
लहना= पाना
रजना=रंगा जाना
अमर=प्रभु
-विश्व दीपक 'तन्हा'

16 comments:

राजीव रंजन प्रसाद said...

तनहा जी..
आपकी अपनी ही शैली है। इस रचना का हर पद मुझे कई-कई अर्थ दे गया और हर अर्थ स्वयं में दर्शन था।

"मैं उर्दू के अल्फाज़ जब भी अपने छंदों में भरता हूँ,
गंगा के जल को पाँच वक्त अशआर नज़र मैं करता हूँ"

"मैं माँ को उसके बेटे का हर एक रूप दिखलाता हूँ,
अपनी मैय्यत का बोध करा उन आँखों के मोती पाता हूँ।

मैं अमर के शब्दचित्र में उतरी एक छोटी-सी कविता हूँ,
है शुक्र कि मैं भी उस जैसा कई लोकों का रचयिता हूँ"

मैं आपकी लेखनी को प्रणाम करता हूँ..

*** राजीव रंजन प्रसाद

अनूप शुक्ला said...

बढ़िया भाव हैं!

रजनी भार्गव said...

बहुत सुन्दर भाव हैं

al said...

u hv surely come a long way with this wonderful poem of urs....
the ecstatic beauty comes frm the choice of the conspicuous words..whether it's hindi or urdu all so sav'iable..

let's put it like this it's a numinous piece 4 all n sundry.

Nishant Neeraj said...

Nice! Hopefully it is basically dedication of poetry to everything. Right?

Anyways, I am not a knowledgable person in poetry :), I infer it in that way.

As far as I go through this nicely written poem I cudn't decifer 'Amar' in this stanza.

"मैं अमर के शब्दचित्र में उतरी एक छोटी-सी कविता हूँ,
है शुक्र कि मैं भी उस जैसा कई लोकों का रचयिता हूँ। "

Who is he? :)

amrendra kumar said...

"kavita dil ki aawaz hai..." is kavita ke madhyam se aapne is baat ko bakhoobi pesh kiya hai...par prem ke itne chehron men kahin aapne us chehre ko lakhne men bhool kar di, jisne is kavita ka sabse jayada sath diya hai...shayad aap samajh gaye honge...ummed hai aap bhool ko sudharenge...(if not leave a comment on my blog http://amruthought.blogspot.com/)

Reetesh Gupta said...

बहुत खूब ...बधाई

HARSH said...

Its too good dude..keep it up!!

Nishant Neeraj said...
This comment has been removed by the author.
Nishant Neeraj said...

Hehe thanx for providing dictionary to all lesser-intellects like me. :)

Aur finally Bandi aa hi gayi Mata aur pita ke beech mein, hmm?!

Deepak Agrawal said...

kavi samarat vd bhai ko pranam. Its a privilege to be with u,hamein bahut khush hoti hai ki aapke jaisa kavi hamaara dost hai :)

tanha kavi said...

मित्रों आप सब का धन्यवाद, जो आपने अपना समय दिया।

Anonymous said...

mast hai yaar.thanks, bahut din baad kuchh original dikha.
parag

मोहिन्दर कुमार said...

सुन्दर भाव लिये हुये एक जीवन्त रचना... बधाई

Tara Chandra Gupta said...

"मैं माँ को उसके बेटे का हर एक रूप दिखलाता हूँ,
अपनी मैय्यत का बोध करा उन आँखों के मोती पाता हूँ।

acche bhav hi. kafi accha hi. dhanyvad............
]

amy said...

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